الفتوحات المكية

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فالمعرفة به من كونه إلها و المعرفة بما ينبغي للاله أن يكون عليه من الصفات التي يمتاز بها عن من ليس بإله و عن المألوه هي المأمور بها شرعا فلا يعرف اللّٰه إلا اللّٰه

[طرق المعرفة الإلهية:العقل و النقل و الكشف]

فقامت الأدلة العقلية القاطعة على أنه إله واحد عند أهل النظر و أهل الكشف فلا إله إلا هو ثم بعد هذا الدليل العقلي على توحيده و العلم الضروري العقلي بوجوده و رأينا أهل طريق اللّٰه تعالى من رسول و نبي و ولي قد جاءوا بأمور من المعرفة بنعوت الإله في طريقهم إحالتها الأدلة العقلية و جاءت بصحتها الألفاظ النبوية و الأخبار الإلهية فبحث أهل الطريق عن هذه المعاني ليحصلوا منها على أمر يتميزون به عن أهل النظر الذين وقفوا حيث بلغت بهم أفكارهم مع تحققهم صدق الأخبار فقالوا نعلم أن ثم طورا آخر وراء طور إدراك العقل الذي يستقل به و هو للأنبياء و كبار الأولياء به يقبلون هذه الأمور الواردة عليهم في الجناب الإلهي فعملت هذه الطائفة في تحصيل ذلك بطريق الخلوات و الأذكار المشروعة لصفاء القلوب و طهارتها من دنس الفكر إذ كان المفكر لا يفكر إلا في المحدثات لا في ذات الحق و ما ينبغي أن يكون عليه في نفسه الذي هو مسمى اللّٰه و لم يجد صفة إثبات نفسية فأخذ ينظر في كل صفة يمكن أن يقبلها المحدث الممكن يسلبها عن اللّٰه لئلا يلزمه حكم تلك الصفة كما لزمت الممكن الحادث مثل ما فعل بعض النظار من المتكلمين في أمور أثبتوها و طردوها شاهدا و غائبا و يستحيل على ذات الحق أن تجتمع مع الممكن في صفة فإن كل صفة يتصف بها الممكن يزول وجودها بزوال الموصوف بها أو تزول هي مع بقاء الممكن كصفات المعاني و الأولى كصفات النفس ثم إن كل صفة منها ممكنة فإذا طردوها شاهدا و غائبا فقد وصفوا واجب الوجود لنفسه بما هو ممكن لنفسه و الواجب الوجود لنفسه لا يقبل ما يمكن أن يكون و يمكن أن لا يكون فإذا بطل الاتصاف به من حيث حقيقة ذلك الوصف لم يبق إلا الاشتراك في اللفظ إذ قد بطل الاشتراك في الحد و الحقيقة فلا يجمع صفة الحق و صفة العبد حد واحد أصلا فاذن بطل طرد ما قالوه و طردوه شاهدا و غائبا فلم يكن قولنا في اللّٰه إنه عالم على حد ما نقول في الممكن الحادث إنه عالم من طريق حد العلم و حقيقته فإن نسبة العلم إلى اللّٰه تخالف نسبة العلم إلى الخلق الممكن و لو كان عين العلم القديم هو عين العلم المحدث لجمعهما حد واحد ذاتي أعني العلمين و استحال عليه ما يستحيل على مثله من حيث ذاته و وجدنا الأمر على خلاف ذلك

[وسائل الصوفية في تحصيل المعرفة الإلهية]

فتعملت هذه الطائفة في تحصيل شيء مما وردت به الأخبار الإلهية من جانب الحق و شرعت في صقالة قلوبها بالأذكار و تلاوة القرآن و تفريغ المحل من النظر في الممكنات و الحضور و المراقبة مع طهارة الظاهر بالوقوف عند الحدود المشروعة من غض البصر عن الأمور التي نهى أن ينظر إليها من العورات و غيرها و إرساله في الأشياء التي تعطيه الاعتبار و الإستبصار و كذلك سمعه و لسانه و يده و رجله و بطنه و فرجه و قلبه و ما ثم في ظاهره سوى هذه السبعة و القلب ثامنها و يزيل التفكر عن نفسه جملة واحدة فإنه مفرق لهمه و يعتكف على مراقبة قلبه عند باب ربه عسى اللّٰه أن يفتح له الباب إليه و يعلم ما لم يكن يعلم مما علمته الرسل و أهل اللّٰه مما لم تستقل العقول بإدراكه و إحالته فإذا فتح اللّٰه لصاحب هذا القلب هذا الباب حصل له تجل إلهي أعطاه ذلك التجلي بحسب ما يكون حكمه فينسب إلى اللّٰه منه أمرا لم يكن قبل ذلك يجرأ على نسبته إلى اللّٰه سبحانه و لا يصفه به إلا قدر ما جاءت به الأنباء الإلهية فيأخذها تقليدا و الآن يأخذ ذلك كشفا موافقا مؤيدا عنده لما نطقت به الكتب المنزلة و جاء على ألسنة الرسل عليهم السلام فكان يطلقها إيمانا حاكيا من غير تحقيق لمعانيها و لا يزيد عليها و الآن يطلق في نفسه عليه تعالى ذلك علما محققا من أجل ذلك الأمر الذي تجلى له فيكون بحسب ما يعطيه ذلك الأمر و يعرف معنى ما يطلقه و ما حقيقة ذلك

[حيرة أهل اللّٰه و حيرة أهل النظر]

فيتخيل في أول تجل أنه قد بلغ المقصود و حاز الأمر و أنه ليس وراء ذلك شيء يطلب سوى دوام ذلك فيقوم له تجل آخر بحكم آخر ما هو ذلك الأول و المتجلي واحد لا يشك فيه فيكون حكمه فيه حكم الأول ثم تتوالى عليه التجليات باختلاف أحكامها فيه فيعلم عند ذلك أن الأمر ما له نهاية يوقف عندها و يعلم أن الإنية الإلهية ما أدركها و أن الهوية لا يصح أن تتجلى له و أنها روح كل تجل فيزيد حيرة لكن فيها لذة و هي أعظم من حيرة أصحاب الأفكار بما لا يتقارب فإن أصحاب الأفكار ما برحوا بأفكارهم في الأكوان فلهم أن يحاروا و يعجزوا و هؤلاء ارتفعوا عن الأكوان و ما بقي لهم شهود إلا فيه فهو مشهودهم و الأمر بهذه المثابة فكانت حيرتهم باختلاف التجليات أشد من حيرة النظار في معارضات الدلالات عليه



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